"अंधेरे में "- विश्व कविता ?

"अंधेरे में "- विश्व कविता ?

नमस्कार सर

उम्मीद करता हूं आप बेहतर होंगे।


कल "आधुनिक हिंदी साहित्य की विशेषताएं" प्रश्नपत्र की परीक्षा थी, जिनमें मुक्तिबोध से संबंधित वही प्रश्न थे, जिसकी चर्चा अपने कक्षा में की थी।
मुक्तिबोध की विश्वदृष्टि और मुक्तिबोध की आधुनिकता।
जब मैं मुक्तिबोध की आधुनिकता वाला प्रश्न लिख रहा था, तब मुझे आपके साथ हुई हमारी अंधेरे में पर कक्षाएं याद आ रही थी।
जहां आपने बताया था कि मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में की व्याख्या विश्व कविता के तौर पर होनी चाहिए।
इस बात को मैंने अपनी उत्तर पुस्तिका में भी रेखांकित किया।

लेकिन अब जब मैं परीक्षा देकर आ चुका हूं, मगर फिर भी यह विश्व कविता वाली बात मेरे दिमाग में अटक कर रह गई है।
मुक्तिबोध ज्यादातर जिन विषयों को अपने काव्य की विषयवस्तु के तौर पर अपनाते हैं, वह अंतर्द्वंद्व, आत्मसंदेह, आत्मालोचना, व्यक्तिवांतरण, विद्रोह—इनका संबंध मात्र किसी क्षेत्र विशेष के व्यक्ति से नहीं है।
यह ऐसे विषय हैं, जो पूरी मनुष्य जाति से संबंध रखते हैं।
इसे ही एक दूसरे तरीके से ऐसे समझ सकते हैं कि वह कुछ शाश्वत विषयों का चुनाव करते हैं, और इन विषयों की शाश्वतता क्षेत्र, देश आदि सबका अतिक्रमण करते हुए अपना संबंध पूरी मानव जाति के साथ जोड़ती है।
अतः यह एक आधार हो सकता है मुक्तिबोध की कविताओं को विश्व कविता कहने का।

दूसरा, जो आप बताते हैं कि अंधेरे में कविता को पढ़ते हुए हमें यह बात ध्यान रखनी होगी कि मुक्तिबोध जब यह कविता लिख रहे हैं, उससे पहले जर्मनी में फासीवाद का उदय हो चुका था।
पूरे विश्व ने उस फासीवादी सरकार के रूप को देखा था।
साथ ही विश्व में कुछ ऐसी और घटनाएं हो रही थी या हो चुकी थी, जिनके पास पूरे विश्व को प्रभावित करने और सबका ध्यान अपनी ओर खींचने का सामर्थ्य था।
ऐसे में यह सब कुछ मुक्तिबोध के वैचारिक अनुभव का भी हिस्सा रहा होगा और इसी की परिणति हम अंधेरे में कविता के तौर पर देखते हैं।
जहां तक मैं समझ पाया, आप यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि चूंकि मुक्तिबोध द्वारा रचित कविता अंधेरे में वैश्विक घटनाओं की परिणति है तथा इस कविता की विषयवस्तु उन वैश्विक घटनाओं से प्रभावित है, जो उस समय उनके वैचारिक अनुभव का हिस्सा रही, इसलिए अंधेरे में कविता की व्याख्या विश्व कविता के तौर पर होनी चाहिए।

लेकिन यदि हम उपरोक्त दोनों आधारों के संदर्भ में कविताओं की व्याख्या विश्व कविता के तौर पर करें, तब हमारे पास हिंदी की न जाने कितनी ढेर सारी कविताएं होंगी, जिनमें ये दोनों गुण परिलक्षित होते हों।
मसलन, क्या शमशेर की कविताएं शाश्वत विषयों की कविताएं नहीं हैं जैसे—टूटी हुई बिखरी हुई, अमन का राग?
वीरेन डंगवाल, जो कि मेरे बहुत पसंद के कवि हैं, उनकी कविता कैसी जिंदगी जिएं, रामसिंह, दुख, प्रेम के बारे में एक शब्द भी नहीं—इन सभी की कविताओं में शाश्वतता है और फिर हर बेहतर कविता वही है जिसमें शाश्वतता है।

रही बात विश्व घटनाओं से प्रभावित कविताओं की, तो अवतार सिंह संधु 'पाश' (आगे से 'पाश') की कविता अब मैं विदा लेता हूं मेरी दोस्त, यह कविता भी तो द्वितीय विश्व युद्ध में फंसे पंजाब के एक नौजवान सैनिक का आखिरी संलाप है।
उस कविता में वह सैनिक युद्धों की आलोचना करता है, उस अवसरवादी दृष्टिकोण की आलोचना करता है जो युद्धों को जन्म देती है।
उसके पास अपने आखिरी समय में केवल आभार है उन सभी चीजों के लिए, जिन्होंने उसके लिए प्रेम कर पाना संभव बनाया।
क्या द्वितीय विश्व युद्ध विश्व इतिहास की समय-रेखा पर एक बहुत जरूरी बिंदु नहीं है, क्या यह एक वैश्विक कविता नहीं हो सकती?

चेतन आर. क्रांति की कविता सीलमपुर की लड़कियां, जिसमें 1990 के आखिरी दशक में जब भारत वैश्विक पूंजी और निवेश के लिए अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोलता है, उस वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण भारतीय महिलाओं में, खासतौर पर एक पिछड़े हुए शहरी इलाके सीलमपुर की लड़कियों पर क्या प्रभाव पड़ता है—कैसे बाजार उन लड़कियों के सोचने-समझने, पहनने-ओढ़ने, उनकी सौंदर्य संबंधी मान्यताओं को कैसे बदलकर रख देता है।
क्या वैश्वीकरण और उससे आम लोगों पर पड़ने वाला प्रभाव एक बहुत जरूरी वैश्विक घटना नहीं है, क्या यह कविता वैश्विक कविता नहीं हो सकती?

और न जाने ऐसे कितने उदाहरण हो सकते हैं।
मैं वैसे भी बहुत कम चीजें पढ़ पाता हूं।
मेरे अध्ययन का अनुभव और दायरा बहुत सीमित है।
लेकिन अगर खोजा जाए तो ऐसी कितनी सारी कविताएं हमारे साहित्य में होंगी।
मैं यह जानना चाहता हूं कि ऐसी स्थिति में मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में को एक विश्व कविता के रूप में देखा जाए, यह विशेष आग्रह क्यों?

मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा।

आदर सहित
लक्की कुमार मिश्रा


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