बुढ़ापे की ओर झुका एक जवान मन

बुढ़ापे की ओर झुका एक जवान मन

प्रिय मित्र,
मुझे कभी पता ही नहीं चला कि मैं कब जवान हो गया, जबकि मैं बचपन से सीधा बूढ़ा हो जाना चाहता था।
मैं एक बाईस साल का नौजवान हूं, जिसे हमेशा इस बात का दुख रहा है कि मैं जवान हुआ, और पता नहीं यह क्या पागलपन है जो मुझे बूढ़ा हो जाने के लिए प्रेरित करता है। मैं चाहता था मैं जल्दी ही बूढ़ा हो जाऊं, लेकिन ऐसा नहीं है कि मैं बूढ़ा होकर मर जाना चाहता हूं, नहीं, मैं बहुत जीना चाहता हूं। मुझे हमेशा लगता है कि देवता हमसे महान केवल इसी लिए हैं कि वे जिए, वे बहुत लंबे समय से जिंदा हैं, क्योंकि उन सब ने अमृत पी रखा है। युगों-युगों तक जी लेने के बाद भला कौन देवता नहीं हो जाएगा। युगों तक जीना यानी कई युगों के अनुभव आपके पास है। मनुष्य इसलिए भी तुच्छ है क्योंकि वह बहुत कम ही जी पाता है। बुढ़ापा एक ऐसी चीज है जिस पर मैं इन दिनों बहुत सोच रहा हूं। क्या मुझे छूट है, मैं आपको एक बात बता सकता हूं। मुझे इन दिनों समझ आया कि आदमी का आस्थावान होना कितना जरूरी है। मेरे घर में दो बूढ़े लोग हैं—एक मेरे बाबा, उम्र लगभग 80 वर्ष; दूसरा दादी, उम्र करीब-करीब 72–75 होगी।

मेरे बाबा बड़े रोचक आदमी हैं। मैंने उन्हें हमेशा ही बूढ़ा ही देखा है। वह अपनी बहुत पुरानी तस्वीरों में भी बूढ़े ही नजर आते हैं। मुझे इस बात पर हमेशा संदेह रहा है कि वे कभी जवान भी रहे हों, और इस बात में ज्यादा यकीन कि हो सकता है क्या पता वे बूढ़े ही पैदा हुए हों। खैर, विषय यह नहीं है। मेरे बाबा हमेशा आस्थावान रहे। उनकी आस्था उनकी है। उनका कोई खास विश्वास मंत्र, हवन या अनुष्ठानों में नहीं रहा। उन्हें शायद ही कोई मंत्र याद हो। मैंने उनके मुंह से आज तक कोई संस्कृत मंत्र या श्लोक नहीं सुना, जबकि उनके पिता एक बहुत बड़े पंडित थे। मैंने जब भी उन्हें पूजा करते हुए देखा, वह देवताओं से याचना करते रहे। उनके मन में एक ख़ास किस्म की कृतज्ञता है देवताओं के प्रति। वह तमाम देवताओं का नाम लेते हुए कहते हैं—"आप सब की कृपा है, आप सब का आशीर्वाद है।"

उनकी आस्था उन्हें एक खास तरह की दिनचर्या उपलब्ध कराती है—सुबह उठना, घूमना-फिरना, अख़बार पढ़ना, नहाना, पूजा करना, घर से थोड़ी दूर एक मंदिर पर जाना, वहां से आना। इन सब के बाद खाने-पीने के अलावा उन पर और कोई काम नहीं है। मुझे लगता है बस इन्हीं चीजों का उनके जीवन में मतलब बना हुआ है। यह आस्था उन्हें अगले दिन जीने के लिए प्रेरित करती है, उनके जीवन को एक मिनिंग देती है, और यह कोई छोटी बात नहीं है।

वहीं दूसरी तरफ मेरी दादी—वह अपने समय में रहते हुए अपने समय से बहुत आगे रही। हम तीन भाई और मेरी एक बहन हैं। बहन सबसे बड़ी है। दादी कभी-कभी बताती हैं, वह हम सभी भाई-बहनों में से सबसे ज्यादा खुश मेरी बहन के जन्म पर हुईं। मां इस बात की पुष्टि करती है—दादी ने सबसे ज्यादा मिठाई मेरी बहन के होने पर बाटी। हम जिस तरह के परिवेश से आते हैं, वहां आज भी लड़की होना कोई खुशी की बात नहीं होती, और वह भी पहली संतान जब लड़की हो जाए तो आमतौर पर लोग खुश नहीं होते। मेरी दादी की मां ने उनसे कहा था—"का रे जवंतिया, पहिले-पहिले लइकिए हो गाइल, ई निमन जोग न हऽ।" मेरी दादी ने उन्हें डांटा और कहा—"हमरा खातिर ईहे सबसे निमन बा, हम चाहत रहनी ह कि हमरा घरे लइकी होखो।" वह अपने समय में बहुत मजबूत औरत थीं। लोग उनसे डरते थे। हमारा पूरा घर भी—पापा, चाचा—सभी उनकी राय के बग़ैर कोई काम नहीं कर सकते थे। उनका पूजा-पाठ से कोई लेना-देना नहीं था। देवताओं में कोई खास रुचि नहीं। उनके पास बहुत जरूरी काम रहे उन्होंने परिवार के सभी लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझा उनके लिए संघर्ष किया मगर जब सभी अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाने नायक हुए तब उनके पास कोई काम नहीं रहा कोई उद्देश्य नहीं। चूंकि उनकी देवताओं में कोई आस्था भी नहीं इसलिए बाबा की तरह उनके पास कोई दिनचर्या भी नहीं थी। आज जब भी मैं उन्हें देखता हूं, मुझे लगता है उनकी जीवन में भी कोई आस्था नहीं बची। लगता है कि वे जी रही हैं क्योंकि उन्हें बस जीना पड़ रहा है। उनके पास अब कुछ करने को नहीं है, उनके पास विश्वास करने को कुछ नहीं है।

मै बहुत करीब से देख पा रहा हूं आस्था से भरा होना आपके जीवन को तब भी मतलब देता है, जब आपके लिए किसी भी चीज़ का कोई मतलब नहीं होता। देवताओं के प्रति आस्था, लोगों को जीवन के प्रति आस्थावान बनाए रखती है।
मैं नहीं जानता कि देवताओं का रहस्य क्या है। यह कितने वास्तविक और कितने मनगढ़ंत हैं। मैं यहां तक भी तैयार हूं कि हो सकता है ऐसा कुछ हो ही न। मगर फिर भी मैं इसकी उपयोगिता को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।

अहमद फ़राज़ का एक शेर है—
"कहानियाँ हीं सही, सब मुबालग़े ही सही,
अगर वो ख़्वाब है तो ताबीर करके देखते हैं।"

तुम्हारा दोस्त ....

मिलन मिश्रा


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