हमेशा विचारशील रहो
मेरी दोस्त...
कैसी हों,तुमने मुझे कहा था हमेशा विचारशील रहो, मैं कोशिश करता हूं।
मुझे लगता है हर एक चीज लिख दी जानी चाहिए लेकिन फिर सोचता हूं क्या ऐसा कुछ संभव भी है। दुनिया के तमाम खाली पन्नों पर, लिखे गए पन्नों के हाशिए पर, हर किताब के पीछे, यूनिवर्सिटी की दीवारों पर छपे हर छात्र नेता के मुंह पर लिख भी लिख दिया जाए तो भी हमारे बीच हुई दस दिन की बातों के लिए भी जगह कम पड़ जाएगी। जितना भी लिखा जाएगा उससे कई गुना रह जाएगा शेष। शायद सबसे महत्वपूर्ण न लिखा जा सकता है ना ही बताया जा सकता है सबसे महत्वपूर्ण केवल समझ लिया जाता है उसकी अभिव्यक्ति संभव नहीं। "मलयज"ने ठीक कहा शब्द स्वयं एक बाधा है अभिव्यक्ति के रास्ते में। मैं फिलहाल बिल्कुल भी नहीं सोच पा रहा हूं मुझे तुमसे क्या बात करनी चाहिए, तो मैं तुम्हें बताता हूं मुझे एक बैग लेना है जिसमें रखी जा सके किताबें और लाया जाए लाइब्रेरी, पढ़ा जाए और वापस रख दी जाए किताबें बैग में। सिर्फ उसमें से वही किताब निकाली जाए जो पढ़ना हो बाकी पड़े रहने दिया जाए उसी जगह बिना किसी हस्तक्षेप के। क्या बातें करते हुए यह सब संभव नहीं की सारी बातों को रखा जाए तह ब तह और निकाली जाए या बोली जाए वही बातें जो जरूरी हो बाकी वैसे ही पड़ी रहे भीतर। मैं बात करते हुए हर वह बात कर देता हूं जो गैर जरूरी थी जो नहीं बोली जानी चाहिए थी या जो मैं बोलना भी नहीं चाहता था।
मुझे लगता है मुझे खुद को जमा कर देना चाहिए तुम्हारे पास पूरे का पूरा और रोज मांगना चाहिए खुद को उतना ही जितना एक दिन में खर्च करने की जरूरत है और यह भी तुम ही तय करो कि कितना जरूरी है एक दिन का खर्चा ।
मुझे मिला जो भी उसने कहा अच्छा इंसान मुझको मगर वह तुम थे जिसने साबित किया मैं कितना खराब हूं कितनी खराब है मेरी आदत। तुम्हारा हर बार संदेह से देखना मुझे खराब बनता है।
जवाब का इंतजार रहेगा हमेशा की तरह।
तुम्हारा खूबसूरत दोस्त
मिलन मिश्रा