हर चीज़ बदलती रहती है

हर चीज़ बदलती रहती है
आदमी पेचीदा हो सकता है

प्रिय दोस्त 

खूब ढ़ेर दिन हुए तुमसे बात किए हुए,

अभी अभी एक किताब खत्म करके उठा हूं, पर वो कही किसी जगह भीतर रह गई है। कथानक बहुत जोरदार न होने के बाद भी एक खल पात्र से बहुत ज़्यादा जुड़ा महसूस कर रहा हूं। जैसे जैसे पात्र खुलता है वैसे वैसे उसे खुद के बहुत नज़दीक पाता हूं। उसके व्यक्तिव की सारी जटिलता मेरी ही तो है, उसकी सारी हीनता ग्रंथियां मुझसे ही तो मिलती है, वो जिस चीज को अपना झूठा अभिमान मानता है, जो चीजे उसे गर्व से भर देती है वे सब की सब गलत है मगर उनका अपना एक कारण है। मैं ऐसा महसूस कर रहा हूं जैसे मैं खुल कर बात नहीं कर पा रहा शायद यह काम कभी मेरे बस का रहा भी नहीं है। 

आदमी पेचीदा हो सकता है पर इससे वह बुरा कैसे हो जाता है? अगर वह थोड़ी देर पहले कही अपनी बात से मुकर जाएं तो वह झूठा कैसे हो सकता है? यह भी संभव है कि एक समय पर उसे कुछ ठीक लगता है और दुसरे ही समय वहीं चीज खराब लगने लगे। ' हीरेकील्टस' कहता है कि हर चीज सदा बहती रहती है आप जिस नदी में उतरते है कुछ समय बाद वह वहीं नदी नहीं रह जाती जिसमें अपने अपने पांव डाले थे। वह अब दूसरी है कोई और।  तो क्यों हमें इस बात का दुख हो की वह वहीं नहीं रहा, क्यों बदलते रहने को हमने नकारात्मक अर्थों में लिया?  हमें इस बात का संतोष क्यों नहीं है कि हमने हर बार कुछ नया पाया । वचन जैसी चीजें मनुष्यों को जड़ बनाने के कर्म में उठाए गए कई कदमों में से एक है। वचन या वादा जैसा कभी कुछ नहीं होना चाहिए क्योंकि किसी चीज का कोई मतलब नहीं है कोई भी नहीं, हमेशा अर्थ तलाशते रहना एक बीमारी से ज़्यादा और कुछ नहीं।

या हो सकता है मै गलत हूं....

चिट्ठियां लिखता तुम्हारा दोस्त - मिलन मिश्रा

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