इसे कहते है दिन बन जाना
प्रिय लक्की,
पत्र के लिए धन्यवाद
आप अपनी बात कल स्पष्ट तौर पर कह पाए थे। सौंदर्य अनुभूति और व्यक्तित्वांतरण के बीच रिश्ता है। सौंदर्य का अनुभव आपमें एक तब्दीली तो लाता ही है। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा था कि यह स्थिति अंतिम नहीं होती। यानी उस वक्त लगता है कि वही असली व्यक्तित्व है लेकिन वह एक दूसरे अनुभव के साथ फिर बदल सकता है। तो एक अस्थिरता और तरलता की संभावना हमेशा ही रहती है।
आपकी इस बात से सहमत हूँ कि सौंदर्य का लाभ एकाकार या तदाकार होने की जगह संभवतः पृथक होने से जुड़ा हुआ है। ब्रेख़्त का सिद्धांत एक दूसरे रूप में इस बात को समझने की कोशिश करता है।
मुक्तिबोध की कविताओं में आवृत्ति या एकरूपता को आपने ठीक नोट किया है। उनकी कविताओं में आप अंतर्पाठीयता देख सकते हैं। एक कविता दूसरी की याद दिलाती है और कई बार उसे बढ़ाती है या उसकी व्याख्या करती है। आपकी आख़िरी बात का संकेत तो मैं समझ रहा हूँ लेकिन वह पूरी तरह साफ़ नहीं है। उसपर मिलकर बात कर सकते हैं। आप ध्यान से और अपनी निगाह से मुक्तिबोध को पढ़ रहे हैं। यह मेरे लिए संतोष की बात है।
स्नेह सहित,
आपका अपूर्वानंद