मैं अब धार्मिक होने लगा हूं
प्रिय मित्र मैं मानता हूं मै बहुत दिनों बाद तुमको पत्र लिख रहा हूं लेकिन यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिए मुझे तुमसे माफ़ी मांगनी चाहिए। अब जब यह संवाद एक तरफा ही है तब मुझे लगता है मेरे पास इस बात की पूरी पूरी छूट है। खैर अब हमें विषय पर आना चाहिए। शायद तुम्हें यह जान कर हैरानी हो, मैं अब धार्मिक होने लगा हूं। लेकिन मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूं यह किसी भी तरह का आरोपण नहीं है यह बहुत ही सजग होकर अपनाया गया व्यवहार है और जब मैं कहता हूं सजगता तो मैं इसके मानी भी जानता हूं। लेकिन यहां एक समस्या है मैं जैसे ही किसी को अपने धार्मिक होने के बारे में बताता हूं वह बिना कुछ सोचे समझे मुझे कट्टरवादियों की पंक्ति में खड़ा कर देता है, मुझे एक खास किस्म की विचारधारा से जोड़ कर देखने लगता है और जब मैं उसकी आंखों में देखता हूं तब वह मुझे साफ साफ कह रही होती हैं बोलो तुम्हारा क्या स्वार्थ था जो तुम औरों की तरह बह गए तुमने यह कौन सी राह ले ली, तो क्या अब तुम भी राम नाम के नारे लगाओगे? भला ऐसी कौन सी आफत आन पड़ी की तुमने एक ऐसे ईश्वर को चुना जो धर्म के नाम पर शंकुक का गला काट देता है क्योंकि वह निम्न वर्ण विशेष का होकर वेद पढ़ने की हिम्मत करता है, बताओ मुझे क्या तुम एक ऐसे ईश्वर में यकीन रखते हो जो अपनी पत्नी की पवित्रता की जांच अग्नि परीक्षा के द्वारा करता है, जो एक निरर्थक आरोप के आधार पर अपनी पत्नी को निर्वासित कर देता है। क्या तुम सच में उसे ईश्वर मानते हो? मेरा जवाब होता है नहीं मैं उसे ईश्वर नहीं मानता और मैं कहता हूं कि आप भी उसे ईश्वर न माने आपके पास उससे यानी ऐसे ईश्वर से नफ़रत करने की भी छूट है आप ऐसे राम से नफ़रत कर सकते है मगर मैं फिर भी कहूंगा आप अपने हिस्से के राम से नफ़रत मत कीजिए। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसका जवाब मेरे पास है। आज से लगभग साल भर पहले मैं एक बहुत बड़े लक्ष्यचंडी महायज्ञ में शामिल हुआ था जहां उत्तर तथा दक्षिण भारत से लगभग तीन हजार वैदिक ब्राह्मण उस यज्ञ का हिस्सा थे। मैं वैदिक नहीं था मेरा तो जनेऊ भी नहीं हुआ था मैं तब एक झूठा जनेऊ धारण कर उस यज्ञ का हिस्सा हो गया था। वहां एक बड़ी सी यज्ञशाला में सैकड़ों हवनकुंड थे जहां ब्राह्मण अपने अपने समूह के साथ बैठकर मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती के श्लोकों के साथ हवनकुंड में आहुतियां अर्पित करते थे जिससे खूब सारा धुआं उत्पन्न होता था और प्रमुख आसन पर बैठे हुए ब्राह्मण को वह सबसे ज़्यादा परेशान करता था इसलिए कोई भी ब्राह्मण उस प्रमुख आसन पर बैठना नहीं चाहता था अपने समूह के ब्राह्मणों में यह काम मैने ले लिया था क्योंकि उस आसन पर बैठा हुआ ब्राह्मण धुएं से बचाव के लिए अपने मुंह पर अपना अंगवस्त्र ओढ़ लेता था जिससे उसे श्लोक न पढ़ने की छूट मिल जाती थी और मैं किसी भी तरह श्लोक पढ़ने में बाकी वैदिक ब्राह्मणों की तरह निष्णार्त नहीं था सो यह काम मैने अपने जिम्मे ले लिया। चूंकि यह यज्ञ देवी से संबंधित था सो मैने खूब प्रयास किए कि मैं उस देवी के प्रति आस्थावान हो सकूं मेरे सारे प्रयासों के बाद भी यह संभव नहीं हो पाया। मगर मैंने उन दिनों एक दूसरी चीज महसूस की। मैने पाया कि मैं प्रेम के प्रति बहुत गहरे तौर पर आस्थावान होने लगा था। जहां सभी ब्राह्मण पुराण के श्लोकों का उच्चारण कर रहे होते थे वहीं अपने मुंह पर अंगवस्त्र डाले मैं हवनकुंड के समीप बैठकर अपनी तथा अन्य कवियों की प्रेम कविताएं पढ़ता रहता था। एक दिन यूंही हवनकुंड पर बैठें हुए मैने महसूस किया कि सभी का ईश्वर एक नहीं हो सकता , सबके अपने अपने ईश्वर है। मैने अपने ईश्वर के तौर पर प्रेम को चुना है, मेरा ईश्वर प्रेम है। मैं अपने राम को भी इसी रूप में देखता हूं। इसीलिए मैं आपसे कहता हूं आप अपने हिस्से के राम से नफ़रत मत कीजिए। आप अपने हिस्सा के राम को खोजिए। यदि आप इस खोज में एक ऐसे राम से मिलते है जो वेद पढ़ने पर किसी निम्न वर्ण से आने वाले व्यक्ति का गला काट देते है तो आप उन्हें नकार दीजिए, आप निषाद के मित्र के रूप में राम को स्वीकारिए, आप उस राम को स्वीकारिए जिससे नदी पार करवाने पर केवट उतराई नहीं लेता और खुद को राम का सजातीय बताता है और कहता है मैं यहां लोगों को नदी पार करवाता हूं आप लोगों को भवसागर पार कराते है। दरअसल हम दोनों ही एक ही तरह का काम करते है और एक ही तरह का काम कर रहे लोग आपस में मजूरी का लेनदेन नहीं करते, जब मैं आपके यहां आऊं तो आप मुझे भवसागर पार करा दीजिएगा हमारा हिसाब बराबर हो जाएगा। जो राम केवट की इस बात को स्वीकारते हैं आप उन्हें स्वीकारिए। इस खोज में यदि आपको अपनी स्त्री की परीक्षा लेने वाले और उसे निर्वासित करने वाले राम मिलते हैं तो ऐसे राम से उनका देवत्व छीन लीजिए और ऐसे राम को स्वीकारिए जो अपने पति द्वारा पतित मान कर शिला कर दी गई स्त्री का उद्धार करते हैं। आप उस राम को मानिए जो अपनी स्त्री और उसकी स्वतंत्रता के लिए सामर्थ्यविहीन होते हुए भी वानरों और रीछों की सेना लेकर विश्वविजई रावण से युद्ध करने को तैयार हैं, आप उस पुरुषार्थ को मानिए। यहां मुझे गांधी याद आते हैं जो अपनी प्रार्थना सभाओं में कहते थे “हम जिन राम के गुण गाते हैं, वे वाल्मीकि के राम नहीं हैं, वह तुलसी के राम नहीं हैं। हम जिस राम का स्मरण करना चाहते हैं और जिनका स्मरण करना चाहिए वह दूसरों की कल्पना के नहीं हमारी कल्पना के राम हैं,” दरअसल समस्या व्यक्ति के धार्मिक और उसके धार्मिक न होने से नहीं है समस्या हड़बड़ी की है। हम एक तरह की हड़बड़ी में हैं चीजों की उपयोगिता और अनुपयोगिता तय करने की हड़बड़ी में, निष्कर्ष तय करने की हड़बड़ी में और सबसे बड़ी हड़बड़ी मूल्यांकन की हड़बड़ी में हम बहुत जल्दबाजी में किसी भी चीज के सही और गलत का मूल्यांकन करना चाहते हैं हमें इन मूल्यांकनों से बचने की आवश्यकता है। धार्मिकता को कट्टरता से जोड़ कर देखने की जो यह परम्परा चल पड़ी है अत्यंत घातक है। धार्मिकता के सही अर्थ कट्टरता की नहीं मानवीय पृष्ठभूमि पर अंकित है। सरफराज आरिश का एक शेर है “ जहां जिंदगी की किताब में तेरी आंख बारे है तजकिरा उसी सफ़ा पर तेरा ख़्वाब है तू पढ़ें तो तुझको पता चले। ” हमारे पास ईश्वर को लेकर चुनाव की पूरी स्वतन्त्रता है। यहां किसी तरह का कोई बंधन नहीं है। वाल्मीकि, स्वयंभू , भवभूति और तुलसी की परम्परा में आप भी अपने राम की सर्जना कर सकते है। यह आपका रास्ता है और यदि आप ऐसा नहीं कर पाते तब भी इसमें किसी तरह का कोई दोष नहीं जो व्यक्ति धार्मिक नहीं इसका मतलब यह नहीं कि वह मानवीय नहीं है या सामाजिक नहीं है। हमें हमारे जीवन में इस बात की पूरी स्वतन्त्रता है कि हम किस तरीके से अपने जीवन को साधते हैं। हम बिना आस्थावान हुए भी मानवीय हो सकते हैं लेकिन मैं फिर कहूंगा कि यह फैसला भी सजग होकर लिया गया फैसला हो। हमें ध्यान देना होगा कि यह अनास्था भी कही किसी पद्धति और विचार के दवाब के कारण तो पैदा नहीं हो रही। हमें पूर्ण निरपेक्षता से इस प्रश्न पर भी विचार करना चाहिए।
मैं सीसीफस के साथ ज्यूस द्वारा किए गए व्यवहार को श्राप नहीं वरदान मानता हूं। मैं जीवन को उसकी सुंदरता में देखना चाहता हूँ। मैं इस सृष्टि से खूब ढेर सारी चीजें चाहता हूं जिनमें से एक यह भी है कि मैं अपने संपूर्ण जीवन में इस जीवन के प्रति और ईश्वर के प्रति आस्थावान रहना चाहता हूं।
तुम्हारा दोस्त .... मिलन मिश्रा