मैं बस बूढ़ा हो जाना चाहता हूं

मैं बस बूढ़ा हो जाना चाहता हूं

प्रिय दोस्त,

यह बहुत दुखद है ,मुझे सब याद आता रहता है। तुम्हें याद है हम एक रोज यूँही बैठे हुए थे? दरअसल, उस वक्त हम अपनी पसंद-नापसंद पर बात कर रहे थे, और मैंने तुमसे कहा था कि मैं बस बुड्ढा हो जाना चाहता हूँ। तुमने कारण पूछा, मेरा जवाब था—"मुझे लोगों को आशीर्वाद देने का मन करता है।"

हमारे बुजुर्गों के पास अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग हिसाब के आशीर्वाद हैं। मसलन, एक नवविवाहित स्त्री के लिए कहा जाता है—"तोहर सुहाग लम्हार होके, भगवान तोहार कोख भर देस" (तुम्हारा सुहाग लंबा हो, भगवान तुम्हारी कोख जल्दी भर दे)। एक गर्भवती औरत के लिए—"भगवान तोहके बेटा देस" (भगवान तुम्हें बेटा दे)। एक औरत जिसका बच्चा हो चुका है, जिसने अपनी गृहस्थी में एक लंबा समय गुज़ार लिया है, उसे आशीर्वाद दिया जाता है—"तोहार मांग-कोख फुलईल रहो" (तुम्हारी मांग और कोख फूली-फली रहे)। ठीक इसी तरह, अलग-अलग आयु वर्ग के पुरुषों के लिए अलग-अलग आशीर्वाद—"खूब खुश रहा, भगवान तोहके बुद्धि-विद्या देस" ( खूब खुश रहो भगवान तुमको खूब बुद्धि विद्या दे ), "निमन मेहरारू मिलो" (बढ़िया पत्नी मिले), "घर-द्वार बनल रहो, खूब नाम करा" (घर-द्वार कुशल रहे, खूब नाम करो)। और भी किस्म-किस्म के आशीर्वाद...

मैं जल्द ही बूढ़ा हो जाना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि सभी को एक ही किस्म का आशीर्वाद दूँ—और वह आशीर्वाद हो—"जियो और प्रेम करो।"

मैं उस दिन को याद करता हूँ और सोचता हूँ—कहीं मैं आशीर्वाद की आड़ में लोगों को श्राप देने की कोशिश तो नहीं कर रहा था? इस दुनिया को प्यार कर पाना बहुत मुश्किल काम है। ऐसा क्यों है कि आदमी के खुद के सीने में संताप और अकेलेपन के लिए ज्यादा जगह है? क्यों वह प्रेम के आँगन में लगे माड़ो (उत्सवों पर बनाया जाने वाला एक किस्म का पांडाल) को छोड़कर अंधेरी कोठरियों की तरफ भागता है?

तुम्हें पता है, यूनान के दार्शनिक ठीक थे, जिन्होंने कहा—"यह दुनिया प्रतिबिंब है।" मगर यह प्रतिबिंब केवल एक स्तर का नहीं है—यह बस स्तरीकृत होता चला जा रहा है। प्रतिबिंब के भीतर प्रतिबिंब। दरअसल, "दुनिया प्रतिबिंब है"—यह बात **"दुनिया माया है"—इस बात को पुष्ट करती है, और प्रतिबिंबों का स्तरीकृत होना ही माया का जटिल होते जाना है।

दोस्त, तुम्हें पता है—मैं जब आकाशगंगा का एक संकुचित चित्र देखता हूँ और अपने न्यूरॉन सिस्टम का, तब मुझे यह दोनों समान लगते हैं। मुझे लगता है, यह पूरा ब्रह्मांड किसी बहुत बड़े जीव का सिर है, और ब्रह्मांड में घटित होने वाली संपूर्ण घटनाएँ केवल उसके चिंतन में हैं—वास्तविकता में नहीं। परन्तु यह सब कुछ बिल्कुल यथार्थ लगता है। हमारा दिमाग भी उसी के दिमाग का छोटा प्रतिबिंब है। तुम्हें पता है, हमारा दिमाग इल्यूजन और रियलिटी में फर्क नहीं कर पाता। जैसे एक छात्र जब अपने भावी परीक्षा परिणामों के बारे में सोचने लगे—यदि इसकी परीक्षाएँ बेहतर न बीती हों—तब इस स्थिति में वह अपने भविष्य में होने वाले परिणामों के बारे में चिंतित होने लगेगा। एक भविष्य में होने वाली घटना का भय महसूस करने लगेगा—और एक ऐसा भय जो उसे भविष्य में होना था, वह उस भय की अनुभूति वर्तमान में करने लगेगा। एक ऐसी घटना जो अभी घटी भी नहीं है, वह उसे परेशान करके रख देगी। एक भविष्य की आभासी घटना उसका यथार्थ बन जाएगी—वह उस भय को जीना शुरू कर देगा, जो अभी घटित भी नहीं हुआ है, केवल आभासी है। कहने का मतलब यह है कि इसी स्थिति में हमारा दिमाग एक आभासी घटना को यथार्थ मान लेगा। यही माया है—हम दरअसल खुद पर भरोसा भी नहीं कर सकते हैं।

मैं और खूब सारी बातें तुमसे करना चाहता हूँ, परन्तु यह सब बहुत जटिल है। इसकी अभिव्यक्ति इतनी सरल नहीं है। मुझे लगता है—जीवन में बने रहना और चिंतनशील रहना, यह दोनों क्रियाएँ साथ में बहुत मुश्किल पैदा कर सकती हैं। यह आशीर्वाद कैसा रहेगा—"हमेशा चिंतनशील रहो"? शायद नहीं—यह घातक है। "जियो और प्रेम करो"—यही सही रहेगा। यह सरल है।

मैं इस पत्र के जवाब के इंतज़ार में नहीं रहूँगा। तुम्हारे पत्र का विषय अलग भी हो सकता है।

तुम्हारा नौजवान दोस्त, जिसे कुछ दिनों पहले कोई "बूढ़ा" कह चुका है।

मिलन मिश्रा

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मुक्तिबोध का सौंदर्य बोध और व्यक्तितावंतरण

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