मुक्तिबोध का सौंदर्य बोध और व्यक्तितावंतरण

मुक्तिबोध का सौंदर्य बोध और व्यक्तितावंतरण
मनुष्य के तमाम द्वंद्व एक दूसरे से जुड़े है।

नमस्कार ,

उम्मीद है आप अच्छे होंगे ।

आज जब मैं आपसे मुक्तिबोध के सौंदर्य बोध और व्यक्तितावंतरण पर बात कर रहा था तब मुझे लगा कि जो मैं कहना चाहता था वह नहीं कह सका इसलिए आपको यह पत्र लिख रहा हूं। मुक्तिबोध के निबंध 'तीसरा क्षण' (जो 'एक साहित्यिक की डायरी' में संकलित है) के एक लंबे हिस्से में सौंदर्य पर गहन चर्चा की गई है। इस निबंध में, जहाँ से सौंदर्य की बात शुरू होती है, उसके प्रारंभिक भाग में मुक्तिबोध एक प्राकृतिक दृश्य को देखते हुए सौंदर्य की अनुभूति करते हैं। वे उस सौंदर्य-अनुभव को परिभाषित करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। वे लिखते हैं:"मैं नहीं जानता कि मैं क्या अनुभव कर रहा था। मैं केवल यही कह सकता हूँ कि किसी मादक और अवर्णनीय शक्ति ने मुझे भीतर से जकड़ लिया था। मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि उस समय मेरे अंतःकरण के भीतर एक कोई और व्यक्तित्व बैठा था। मैं उसे महसूस कर रहा था। कई बार उसे महसूस कर चुका था। किंतु अब तो उसने मेरे भीतर से मुझे बिल्कुल ही पकड़ लिया था। मैं जो स्वयं था, वह स्वयं हो गया था। अपने से वृहद, विलक्षण और अस्वयं।"मुक्तिबोध की कई कविताओं में एक खास किस्म की एकरूपता देखी जा सकती है। यह वही रचनात्मक एकरूपता है जिसे हम  इंटरडिसिप्लिनरी पोएट्री (interdisciplinary poetry) कहते है। इसका कारण यह है कि मुक्तिबोध जिन अलग अलग आंतरिक द्वंद्वों की अभिव्यक्ति अपनी अलग अलग कविताओं में कर रहे है वह  मनुष्य के तमाम द्वंद्व एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। मुक्तिबोध अपनी रचनाओं में कई शब्दों की पुनरावृत्ति करते हैं, जिनमें से एक प्रमुख शब्द है—'व्यक्तित्वांतरण'। यह 'व्यक्तित्वांतरण' सौंदर्य की अनुभूति के कारण ही संभव हो पाता है। अर्थात, मुक्तिबोध सौंदर्य को 'व्यक्तित्वांतरण' के रूप में देखते हैं।मुक्तिबोध के अनुसार, व्यक्तित्वांतरण के बाद प्राप्त काया ही व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप होती है। उनके लिए सौंदर्य एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य को उसका वास्तविक स्वरूप प्रदान करता है। इससे व्यक्ति उदात्तता को प्राप्त होता है। मुक्तिबोध इसी निबंध में एक जगह कहते हैं:"किसी वस्तु, दृश्य या भाव से मनुष्य जब एकाकार हो जाता है, तब सौंदर्य-बोध होता है।"हालाँकि, मैं इस सौंदर्य-उत्पत्ति की पूरी प्रक्रिया को एकाकार की प्रक्रिया के रूप में नहीं देख पाता। मेरी दृष्टि में, यह एकाकार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि 'पृथक्करण' की प्रक्रिया है। क्योंकि यदि व्यक्तित्वांतरण हो रहा है, तो वह एक व्यक्तित्व के पृथक हो जाने के कारण ही संभव है, न कि एकाकार हो जाने के कारण।आगे चलकर, मुक्तिबोध सौंदर्य-उद्भावना को लेकर एक प्रश्न उठाते हैं: क्या सौंदर्य की मीमांसा पाठक की दृष्टि से की जाए या लेखक की दृष्टि से? यहाँ एक समस्या उत्पन्न होती है। समस्या यह है कि सौंदर्य-प्राप्ति के कई स्रोत हो सकते हैं। मसलन, एक व्यक्ति को एक पुरानी जर्जर खिड़की देखकर सौंदर्य की अनुभूति हो सकती है, दाना चुगती चिड़िया को देखकर सौंदर्य की अनुभूति हो सकती है, कोई प्राकृतिक दृश्य देखकर सौंदर्य की अनुभूति हो सकती है, या किसी साहित्यिक गतिविधि के माध्यम से भी सौंदर्य की अनुभूति हो सकती है। इन सभी माध्यमों से प्राप्त सौंदर्य में एक आंतरिक एकरूपता होती है।तब इस स्थिति में, गैर-साहित्यिक स्रोतों से प्राप्त सौंदर्य की व्याख्या हेतु क्या पाठक और लेखक ये दो प्रस्थान बिंदु माने जाएँगे? शायद नहीं। अलग-अलग माध्यमों के लिए अलग-अलग प्रस्थान बिंदु हो सकते हैं। और फिर, अलग-अलग प्रस्थान बिंदुओं के आधार पर सौंदर्य की मीमांसा करने से गहरी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।मैं जो भी बातें कह रहा हूं उसमें किसी भी तरीके से मुक्तिबोध की दृष्टि का खंडन नहीं है दरअसल मुक्तिबोध चीजों को एक खास तरीके से समझने की कोशिश कर रहे हैं। मैं दरअसल उन चीजों को इस तरीके से देख रहा हूं। आप क्या सोचते है यह कितना सही तरीका है ? जवाब का इंतजार रहेगा।

आदर सहित

लक्की कुमार मिश्रा (मिलन)

Read more