मैं जहाक बन चुका हूं

मैं जहाक बन चुका हूं
मुझे माफ़ करना देवताओं मैने प्रेम नहीं किया

मैं संबोधनो को लेकर हमेशा असमंजस में रहा हूं मुझे तब भी नहीं पता था तुम्हे क्या कहकर संबोधित करू और आज भी ऐसा ही है मेरे खयाल से यही सही रहेगा।

प्रिय दोस्त .. एक बार एक व्यक्ति जो बार-बार प्रेम में असफल हो चुका था बुद्ध के पास पहुंचा और बहुत ही करुण हृदय से बुद्ध से पूछा - मैं कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो प्रेम का दुश्मन हो, मैं तो अपने जीवन में प्रेम का बहुत सम्मान करता हूं, मैं चाहता हूं कि मैं किसी से टूट कर प्रेम करूं। तब तथागत आप बताइए कि मेरे चाहने पर भी मैं बार-बार प्रेम में असफल क्यों सिद्ध होता रहा हूं , क्या मैं इस असफलता को अपनी नियति मानकर इस प्रेम भाव का ही त्याग कर दू ,आप बताइए तथागत मैं इसके लिए क्या कर सकता हूं? बुद्ध प्रश्न सुनने के बाद थोड़ी देर मौन रहे फिर बोले एक छोटे से बर्तन में जल लेकर उसमें एक मुट्ठी नमक डाल दो और बताओ क्या वह पानी पीने योग्य रहेगा। व्यक्ति जवाब देता है नहीं वह पानी नहीं पिया जा सकता तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं पिया जा सकता। बुद्ध मुस्कुराते हैं और कहते हैं अब वही मुट्ठी भर नमक एक नदी में डाल दिया जाए तो बताओ क्या उस नदी का पानी पीने योग्य रहेगा। आदमी तुरंत जवाब देता है बिल्कुल तथागत एक मुट्ठी नमक भला नदी के मीठे पानी पर क्या ही प्रभाव डाल पाएगा, एक मुट्ठी नमक से नदी के पानी की मिठास पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बुद्ध ने पुनः उसे व्यक्ति से पूछा तो बताओ क्या तुम्हें तुम्हारा जवाब मिल गया व्यक्ति ने तुरंत बुद्ध के आगे हाथ जोड़ लिए और बोला माफ कीजिएगा प्रभु लेकिन मैं आपके आशय को समझने में असमर्थ हूं। बुद्ध ने बोला देखो वत्स तुम प्रेम करने की इच्छा तो रखते हो परंतु तुम्हारा ह्रदय उस छोटे बर्तन जैसा है जिसमें एक मुट्ठी नमक यानी नकारात्मकता भर देने से तुम्हारे लिए प्रेम करना असम्भव हो जाता है और कोई भी व्यक्ति सकारात्मक और नकारात्मक नहीं हो सकता। वह इन दोनों तत्वों का सम्मिश्रण होता है। तुम्हारी प्रेम संबंधी असफलता का कारण तुम्हारा संकुचित हृदय है तुम इसे नदी जैसा विशाल और गतिशील बनाओ जिसकी विशालता और गतिशीलता में सारी नकारात्मकता अपने अस्तित्व को ही खो दें और उससे तुम्हारी प्रवृत्तियां तनिक भी प्रभावित न हो तब तुम अवश्य ही प्रेम में सफल हो जाओगे तथागत इतना कह अपने स्थान से उठ गए और आगे चल दिए और वह व्यक्ति भी वापस अपने प्रदेश लौट चला। मुझे ये बात मुझे बहुत देर से समझ आई मैं माफ़ी मांगता हूं हमारा संबंध सफ़ल नहीं हो सका दरअसल वह मेरा ही हृदय था जो उस छोटे बर्तन की तरह संकुचित था जिसने कभी भी उस विशाल नदी का स्वरूप धारण नहीं किया और मैं चाहता हु की मुझे ये कहने दिया जाए की गलती मेरी ही थी। मुझे माफ करना मैं कभी प्रेम नही कर पाया मैं कभी किसी से प्रेम नहीं कर पाया ।

मैंने नदियों और पहाड़ों के देश से आने वाले पक्षियों के गीत नहीं सुने

मैं नहीं बिछ पाया किसी के हृदय पर घास की तरह

मैं किसी के प्रेम में पक कर अपनी डाल से नहीं चू पाया

जिसे उठा ले जाता कोई बच्चा बहुत खुश होकर

मैं टंगा रहा उसी डाल पर बेवजह मौसमों के विरोध में

इस पूरे विद्रोह के कारण में अछूता रहा

नहीं तो नियति तय करती है,

हर कोई प्रेम में पके पूरी तरह और चूए और फिर उठा लिया जाए

किसी इंद्रधनुष से बच्चे द्वारा या सुबह सुबह दुआर बुहारती किसी बुढ़िया द्वारा

मैंने सारे प्रयास किए कि मेरे दोनों कंधो पर दुनिया के सबसे सुंदर दो बगीचे उग आए

जिनकी तितलियां मेरी प्रेमिका की कनीज़ हो

जिनमें वास करने वाले पक्षी वसंत के आने पर फाग गाए उसके कानों में

ये प्रयोग गलत साबित हुए

और मैं ईरानी शासक जाहाक बन गया

जिसके दोनों कन्धों पर सांप निकल आए है ।

पहले ईरान के ऊपर अरब का शासन था। अरब के लोग ईरान के लोगो को दबाते थे यहां तक की उन्हें उनकी भाषा बोलने पर शर्मिंदा करते थे। उसी गुलाम ईरान में एक दिन एक बच्चे का जन्म होता है जिसके पिता बच्चे के जन्म से पहले एक ख़्वाब देखते है की उनका होने वाला बेटा बहुत प्रसिद्धि पाएगा । और फिर हुआ भी ऐसा ही वह बच्चा ईरान का सबसे बड़ा कवि "फिरदोशी" था। जिसने ईरानी भाषा का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ "शाहनामा" लिखा। जिसने ईरानी लोगो को न सिर्फ़ उनकी खोई हुई भाषा का गर्व लौटाया बल्कि उस समय के एक वादाखिलाफ सुल्तान को माफ़ी मांगने पर मजबूर कर दिया। मैं ईरान के इतिहास की बात क्यों कर रहा हूं ? क्योंकि जाहाक जिसके दोनों कंधो पर साप निकल आए थे ईरानी मिथकों के अनुसार वहा का एक शासक था जिसके कंधो पर उगे सांप उसको कुरूरता के लिए प्रेरित करते थे वह रोज़ लोगों को मारता था और वो दोनो सांप उनका खून पीते थे। मेरे भी कंधो पर जाहाक की तरह सांप निकल आए है। जाहाक़ नही समझ पाया था लेकिन मैं जानता हूं मेरे कंधो पर उगे ये सांप किसी दिन मेरे सबसे प्यारे लोगों को खाने की कोशिश करेंगे। मैं नहीं चाहता था ये सांप किसी सुन्दर, प्यारी और पवित्र ( पवित्र इसलिए की तुम मेरे लिए रोई और प्रेम में हंसती हुई लडकी आकर्षक हो सकती है मगर प्रेम में रोती हुईं लड़की से पवित्र कुछ नही होता।) लड़की को खा जाए इसलिए मैंने किसी से प्रेम नहीं किया। मैं माफ़ी चाहता हूं हर एक चीज के लिए यह सब मुझे कई दिनों से रह रह कर साल रहा है। मैं एक बार तुमसे मिलकर माफ़ी मांगना चाहता हूं शायद ये मेरे लिए कुछ काम करे। मैं कितना स्वार्थी हूं यहां भी मेरा अपना ही स्वार्थ है । जवाब का इंतजार रहेगा।

मिलन मिश्रा

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